अफ़ग़ानिस्तान गृह युद्ध की कगार पर : भारत के सिमटते समीकरण – जनरल दुष्यंत सिंह (अवकाशप्राप्त)

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अमेरिका का अफ़ग़ानिस्तान से पलायन
3 जुलाई को अमेरिकी बलों ने प्रसिद्ध बगराम एयरबेस को खाली कर दिया, जो पिछले 20 वर्षों से पूरे अफगानिस्तान में अमेरिकी आतंकवाद विरोधी अभियान का केंद्र बिंदु था। इसी बेस पर स्थित यूएस स्पेशल ऑपरेशंस बल के सैनिकों ने अलकायदा (AQ), इस्लामिक स्टेट (ISIS), तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को अंजाम दिया था। वंही तालिबान और उसका समर्थन देने वाले सभी आतंकी संगठनों ने भी अमेरिका और रिपब्लिक ऑफ़ अफगानिस्तान के सैन्य बालों के खिलाफ पिछले दो दशकों से एक बहुत ही कारगर गौरिल्ला युद्ध छेड़ रखा है । आतंकियों की सफलता के तीन मुख्य कारण हैं । सबसे प्रथम है, अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी और उत्तर पूर्वी छेत्रों की बर्फीली और गगन चुम्बी हिन्दुकुश और पामीर पर्वतीय श्रृंखलााये और मध्य अफ़ग़ानिस्तान की पहाड़ियां, नदी और नालों की मौजूदगी जो गौरिल्ला युद्ध में काफी कारगर साबित होती है। यह बात नीचे दिए हुए मानचित्र में स्पष्ट देखी जा सकती है।
दूसरा कारण है सभी आतंकी गुटों का आपस में भरपूर सहयोग। इस सहयोग का मुख्य कारण है पख्तूनी आचारसंहिता। इस आचारसहिंता के तहत सारे पख्तून आपसी रंजिस भुला कर बाहरी दुश्मन यानि की अमेरिका और उसके अफगानी सहियोगी इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ युद्ध करने को बाध्य करती है। इस आचार संहिता का सिद्धांत है; सबसे पहले, “मैं अपने भाई के खिलाफ, मैं और मेरा भाई हमारे पड़ोसी के खिलाफ, मै और मेरा गांव पड़ोसी गांव के खिलाफ और मेरी जनजाति दूसरी जनजाति के खिलाफ, मैं और मेरा देश दूसरे देश के खिलाफ।” दूसरी आचारसंहिता में तीन उसूल हैं, “पहला “मेलमसतीया (मेहमांनवाजी)”, दूसरा, “बदल (बदला) बदला लेने के लिए कोई समय सीमा नहीं होती है; कुछ तो इसे क़यामत तक निभाते है और तीसरा है “नानवताई” (शरण देना) चाहे वह आपका दुश्मन ही क्यूँ न हो। अगर हम गौर करें तो मेहमांनवाजी और शरण जैसे उसूलों की वजह से बाकी आतंकी ग्रुप तालिबान की छत्रछाया में अफ़ग़ानिस्तान में पनाह पा रहे हैं। दूसरा बड़ा कारण है पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी ISI (अन्तर सर्विसेज एजेंसी ) का तालिबान को पुरजोर सहायता, विशेष कर हक़्क़ानी नेटवर्क को जो की अब तालिबान का महत्वपूर्ण घटक है। तीसरा खास कारण है अमेरिकी बलों का धीरे – धीरे अफ़ग़ानिस्तान से पलायन। खास तौर से बगराम हवाईबेस को छोड़ना जिसकी वजह से अफ़ग़ानिस्तानी डिफेन्स फोर्सेज की हालत काफी नाज़ुक बन गयी है। यह ध्यान देने वाली बात है की पिछले २० वर्षों से बगराम के जुड़वां रनवे से दिन-रात फाइटर जेट, ड्रोन और कार्गो विमानों ने आतंक विरोधी अभियान के लिए लगातार उड़ानें भरी थी। यह बेस आतंकवादी विरोधी करवाई के लिए इतना महत्वपूर्ण था कि पिछले तीन अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने अमेरिकी सैनिकों से मिलने के लिए इसी हवाई बेस का दौरा किया। अमेरिकी फोर्सेज का 2014 से धीरे धीरे वापस लौटना तालिबान की बढ़ती ताकत और अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा का प्रमुख कारण रहे हैं। नीचे दिए हुए ग्राफ में 2014 से 2020 तक अफ़ग़ानिस्तान में हुई हिंसा का विवरण इस तथ्य की स्पष्ट पुष्टि करता है।

छेत्र में बदलते समीकरण
इस वापसी के साथ अफ़ग़ानिस्तान में केवल २५०० से ३००० अमेरिकी सैनिक ही बचे हैं। अंततः अमेरिका द्वारा केवल 650 कर्मियों को छोड़ने की संभावना है। अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा सरकार दिन पर दिन कमजोर होती चली जा रही है। तालिबान का दावा है की उसने देश के लगभग 90 % छेत्र पर अपना वर्चस्व जमा लिया है। ऐसा भी माना जा रहा है की अमेरिका अपने सैनिक निर्धारित समय सीमा से पहले ही वापस बुला लेगा। इसी वजह से तालिबान यह मान कर चल रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता अब उसके हाथों में जल्द ही आने वाली है। और यही कारण है की उसने अभी से चीन को अपने देश में निवेश करने का निमंत्रण भी दे डाला है। इसके साथ साथ चीन के ईरान के साथ आपसी सम्बन्ध सुधरने की वजह से चीन – पाकिस्तान – अफ़ग़ानिस्तान – ईरान का ध्रुवीकरण होने की सम्भावना काफी बढ़ गई है।
यह गठजोड़ और भी मजबूत होसकता है क्योंकि टर्की के सम्बन्ध पाकिस्तान से काफी मधुर हैं और वहीं चीन के सम्बन्ध रूस से। चीन – पाकिस्तान – अफ़ग़ानिस्तान (तालिबान), रूस, ईरान और टर्की का आपसी ध्रुवीकरण भारत की ताकत को इस छेत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक दृष्टिकोण से काफी कमजोर बना सकता है। भारत को किसी भी हालत में इस समीकरण को बनने से रोकना होगा क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो भारत को अफ़ग़ानिस्तान में अपने तक़रीबन तीन बिलियन डॉलर के निवेश से हाथ धोना पड़ेगा, एवम AQIS, ISIS और पाकिस्तानी आतंकवादी जो इस समय अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय है अपना रुख काश्मीर की ओर मोडलेंगे। साथ ही सामरिक स्तर पर ऊर्जा पूर्ति, आर्थिक और राजनैतिक छेत्र में कठिनाईयोंका सामना करना पड़ेगा। उपरोक्त मुश्किलों के अलावा अगर मौजूदा अफगानी सरकार सत्ता से हाथ धो बैठती है तब काफी तादाद में अफ़ग़ानिस्तानी आबादी भारत में पलायन कर सकती है। ज्ञात रहे की इस समय भी भारत में 2019 तक UNHCR के मुताबिक तक़रीबन 40,000 अफगानी शरणार्थी मौजूद हैं। इन आंकड़ों में काफी वृद्धि होने की संभावना है क्योंकि अभी से अफ़ग़ानिस्तान से लोगों का पलायन शरू हो गया है। कुछ इसी सम्भावना को देखते हुए अफ़ग़ानिस्तान सरकार ने भारत और कई अन्य देशों से सैन्य सहायता की गुहार लगाई है। ज्ञातव्य है की भारत ने अफ़ग़ानिस्तान को 122 mm गन के गोलाबारूद की एक खेप C17 द्वारा हाल ही में पहुंचाई है। इस बात पर तालिबान ने अपनी नाराजगी और प्रतिक्रिया भी जताई है। लेकिन मेरे विचार से यह एक उचित कदम है और हमें ज्यादा से ज्यादा इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान की मदद करनी चाहिए। यह मैं इस बिना पर कह रहा हूँ की सोवियत यूनियन के अफ़ग़ानिस्तान से जाने के बावजूद नजीबुल्ला सरकार चार साल तक टिकी रही क्योंकि सोवियत यूनियन उसे आर्थिक और सैन्य मदद पहुंचाता रहा। नजीबुल्ला सरकार के सैन्य बल सोवियत यूनियन के टूट कर बिखरने के बाद ही तालिबान के हाथों पूरी तरह पराजित हुए । इसलिए हम अगर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिलकर अशरफ गनी की सरकार को आर्थिक और सैन्य मदद जारी रखे तो तालिबान का सपना टूट सकता है। इस बात का अंदाज़ा इस बात से भी लगा सकते हैं की भारत के 122 mm गोलाबारूद की मदद के बारे में तालिबान के प्रवक्ता ने टिपण्णी है कि भारत के इस मदद से मौजूदा सरकार की हार सितम्बर तक टल सकती है।

भारत के विकल्प
अफ़ग़ानिस्तान की तेजी से बिगड़ती आंतरिक हालत भयंकर गृहयुद्ध के तरफ इशारा कर रही हैं। मौजूदा हालत हमें १९९० के दशक की याद दिलाती हैं। अफगानिस्तान के 90 के दशक के परिदृश्य में इस बार भी ऐसा जान पड़ता है की अफ़ग़ानिस्तान में भयंकर गृहयुद्ध होगा जिसमे अंततोगत्वा हार अफ़ग़ानिस्तान के आम जनता की होगी और पाकिस्तान, चीन, और ईरान अपनी अपनी रोटियां सकेंगे। इस समय यह कहना बिलकुल गलत नहीं होगा की अफ़ग़ानिस्तान का भविष्य बिल्कुल अप्रत्याशित और धूमिल नज़र आ रहा है। ऐसी हालत में भारत के पास बड़े सिमित विकल्प ही बचे हैं। पहला, मौजूदा अफ़ग़ानिस्तानी सरकार को अपनी सामान विचार धारा वाले मित्र देशों के साथ मिलकर भरपूर और हर संभव सैन्य मदद करना। दूसरा कदम होगा रूस और ईरान को इस ध्रुवीकरण में जुड़ने से रोकना। इस के लिए राजनैतिक कदम ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे। ऐसी आशा की जा सकती है की हमारे विदेश मंत्री जी ने रूस से इस विषय पर चर्चा जरूर की होगी। चीन के बढ़ते कदमों को हमें ईरान में पैर फ़ैलाने से रोकने के लिए चाबहार और जश्क बंदरगाहों पर अपनी पकड़ और मजबूत करनी होगी। अमेरिकी रुख को ध्यान में रखते हुए हमें ईरान के साथ फूंक – फूंक कर कदम उठाना होगा। पाकिस्तान और चीन इस ध्रुवीकरण के महत्वपूर्ण पहलु हैं। उनके आपसी तालमेल को हमें ग्रे-जोन कारवाई द्वारा निबटाना पड़ेगा। इस दिशा में हमें पाकिस्तान के दुश्मनों का साथ देना होगा जैसे की बलोचिस्तान। जहाँ तक चीन का सवाल है हमें उसको उसी की भाषा में जवाब देने की जरूरत है। जैसे कि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उइगर (Uyghur) मुस्लिमों के खिलाफ चीन का अत्याचार, तिब्बत के बुद्धिस्ट लोगों के प्रति सौतेला व्यवहार और सांस्कृतिक नरसंहार, हांगकांग में चीन का अजनतांत्रिक रवैया और ताइवान को खुलकर समर्थन देना है।
अब समय आ गया है हमें ‘एक चीन की नीति’ (One China Policy) को ताक पर रखने का। इन सभी कदमों को कारगर बनाने के लिए हमें अपने खुफ़िआ तंत्रों को और मजबूत और सुदृढ़ बनाना होगा। साथ ही पश्चिमी देशों से मिलकर हमें क्वॉड (QUAD ) का और विस्तार हेतु फ्रांस, ब्रिटैन तथा दक्षिण पूर्व के मित्र देशों वियतनाम, फ़िलीपीन्स, सिंगापुर और इंडोनेशिया को शामिल करना होगा। अफ़ग़ानिस्तान इस समय भारत ही नहीं बल्कि सारे विश्व के लिए एक चुनौती है और हमें इस चुनौती का मिलजुल कर सामना और हल निकलना पड़ेगा। अपने देश की व्यापक राष्ट्रीय शक्ति (Comprehensive National Power – CNP ) जिसमे सैन्य शक्ति भी शामिल है उसको और बढ़ाना होगा। हमें अपने CNP को राष्ट्रीय हितों की दिशा में शाम – दाम – दंड – भेद की चाणक्य निति द्वारा हासिल करना होगा अन्यथ अंतरराष्ट्रीय पटल पर हम पिछड़ते ही चले जायेंगे।

3 thoughts on “अफ़ग़ानिस्तान गृह युद्ध की कगार पर : भारत के सिमटते समीकरण – जनरल दुष्यंत सिंह (अवकाशप्राप्त)

  • July 19, 2021 at 12:08 pm
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    Very well articulated article. The author needs to be complimented for his frank and forthright views.
    If India is in a difficult situation it is her own doing. We invested in Afghanistan in infrastructure domain but did we help Afghan Govt to help her to buildup her Armed Forces. On the other side if we wanted to keep our options open with the Taliban did we do that. Our entire planning was based on an assumption that US and her allies will remain there for many more years. Nothing could be more preposterous than that. For US it was becoming counter productive to remain in Afghanistan and that is why they decided to move out. But even that decision was there since Feb 2020 but we did not react.
    We need to help Afghanistan to rebuild Northern Alliance once again and for that Russia and Iran has to be brought on board. Difficult but not impossible task. In our national interest we need to move swiftly.

    • July 19, 2021 at 8:15 pm
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      Sir you have hit the nail on the head. We often react rather than proactively act. Afghanistan is no exception. However, there is still time. If we play well at the International level there are immense possibilities as you have suggested. Thanks for a constructive comment.

    • July 20, 2021 at 10:51 am
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      Thx sir for constructive comments
      You are right and along with this I also see the possibility of the UN being dragged intoAfghanistan which will make the sit even more volatile, complex and unpredictable.
      Greetings

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