कैसी है वह राह जहाँ पग पग पर बिखरे शूल न हों …….. अभि परमार 🌻

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कैसी है वह राह जहाँ पग पग पर बिखरे शूल न हों

कैसा है वो प्रण प्रयास जिसमे होती कुछ भूल ना हो

कैसा है संघर्ष जहाँ विपदायें प्रतिकूल ना हों

वो कैसा जीवन है जिसकी राह में उड़ती धूल न हो

मत ढूँढो ऐसे उपवन अब जिनमे खिलते फूल न हों

बस कृत निश्चय हो चले चलो संयोग भले अनुकूल न हो

    अभि परमार 🌻

(जयशंकर प्रसाद से प्रेरित)