Changing terrorist strategy in the valley (Hindi) Amar Ujala 20 Oct 2021 Maj Gen Harsha Kakar

Loading

https://www.amarujala.com/columns/opinion/jammu-and-kashmir-changing-terrorist-strategy-in-the-valley

Changing terrorist strategy in the valley (Hindi) Amar Ujala 20 Oct 2021

          जम्मू-कश्मीर में बिहार के दो मजदूरों को निशाना बनाने के बाद वहां प्रवासी समुदाय में दहशत फैल गई है। इस केंद्र शासित प्रदेश में इस महीने अब तक 11 लोगों की हत्या हो चुकी है, जिनमें से पांच गैर कश्मीरी हैं। इसने वहां असुरक्षा का वातावरण बना दिया है, जिसकी वजह से घाटी से पलायन शुरू हो गया है, जैसा कि आतंकवादी चाहते हैं। गैर स्थानीय लोगों में दहशत बढ़ गई है, क्योंकि आतंकी समूहों ने बयान जारी कर उन्हें धमकी दी है कि वे उनके निशाने पर हैं। इन हत्याओं के मॉड्यूल का पता लगाने के लिए राज्य पुलिस ने नौ सौ से अधिक लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की है।

 

 

हाल के दिनों में आतंकवाद विरोधी अभियान में तेजी लाते हुए नौ मुठभेड़ों में 13 आतंकवादियों को मारा भी गया है, जिनमें से कई निर्दोष लोगों की टार्गेट किलिंगमें शामिल थे। हालांकि, इससे पलायन को रोकने और बढ़ते भय को कम करने में बहुत कम मदद मिली है। दरअसल बेगुनाहों को निशाना बनाना आतंकियों की बदली हुई रणनीति है, जहां पहले सुरक्षा बलों पर यह संदेश देने के इरादे से हमला किया जा रहा था कि सैन्य शक्ति को तैनात करके कश्मीरी प्रतिरोध को रोका नहीं जा सकता। चूंकि सुरक्षा बलों को निशाना बनाने की उनकी रणनीति नाकाम होने लगी और आतंकवादियों को कदम पीछे करने पड़े, इसलिए लगता है कि रणनीति में यह बदलाव किया गया है। 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीरी पंडितों और सिखों को इसी तरह से निशाना बनाया गया था, जिसके कारण सामूहिक पलायन हुआ था।

 

 

निर्दोष नागरिक एक आसान लक्ष्य होते हैं, क्योंकि आतंकवाद के मौजूदा माहौल के बावजूद अपनी दिनचर्या के चलते घरों से बाहर निकलते हैं। उनकी निगरानी की जा सकती है और मौका देखकर उन पर हमला किया जा सकता है। जम्मू और कश्मीर की पुलिस ने इस तरह की औचक हत्याओं को हाइब्रिड वारफेयरकहा है, जिसमें आतंकवादी बेगुनाह लोगों को गोली मारकर हत्या कर भाग खड़े होते हैं। वे नजदीक से सुरक्षा बलों पर हथगोला फेंककर भी हमला करते हैं। पूरे क्षेत्र में लगे सीसीटीवी हमलावरों की शिनाख्त करने में बेकार साबित हुए हैं।

 

रणनीति में इस बदलाव के कई कारण हैं। पहला, आतंकवादियों का सफाया तेज गति से हो रहा है। जैसे ही कोई व्यक्ति बंदूक उठाता है और अपनी तस्वीर सोशल मीडिया में साझा करता है, वह सुरक्षा बलों के निशाने पर आ जाता है। इसके साथ ही उसे स्थानीय लोगों का समर्थन मिलना भी कम हो जाता है। इसलिए आतंकवादियों का जीवनकाल बहुत छोटा होता है। मगर बदली रणनीति के कारण हमला करने वाले पुलिस की नजर में नहीं होते, इसलिए उनका खात्मा आसान नहीं होता। हत्या करने के बाद वे स्थानीय आबादी में घुलमिल जाते हैं, जिससे उनको निशाना बनाना कठिन हो जाता है। उन्हें लक्ष्य के बारे में सोशल मीडिया के जरिये या व्यक्तिगत रूप से बताया जाता है और हमले से पहले और उसके बाद वे सामान्य जिंदगी जी रहे होते हैं।

 

दूसरा, घुसपैठ जारी जरूर है, लेकिन सीमित हो चुकी है। पाकिस्तान से नियुक्त आतंकवादी इस समय सुरक्षा बलों से बचने के लिए अपने ठिकानों पर हैं। एक बार जब उनका पता चल जाता है, तो सुरक्षा बल हताहत होने के बावजूद उन्हें खत्म करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे, जैसा कि पुंछ में हाल ही में हुई मुठभेड़ में हुआ। कुछ समय पहले तक मुठभेड़ों में पत्थरबाजों की मौत के बाद और अधिक युवा पाकिस्तान परस्त आतंकी गुटों से जुड़ते जा रहे थे। हुर्रियत के पतन और हवाला धन पर रोक से हिंसा में कमी आई है, इससे पाकिस्तानी आतंकवादियों की गुजर बसर मुश्किल हो गई है।

 

स्थानीय युवाओं को आतंकवाद से जोड़ने से पाकिस्तान को यह लाभ मिलता है कि भारत उसे मौजूदा हत्याओं के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता। यह सुनिश्चित करेगा कि युद्धविराम जारी रहे, जिससे पाकिस्तान अपनी पश्चिमी सीमाओं पर ध्यान केंद्रित कर सके, जहां स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। इस बदली रणनीति में पाकिस्तान ने ए के राइफलों के बजाए पिस्तौल और हथगोले जैसे हथियारों को शामिल करना शुरू कर दिया है। हाल के दिनों में सभी हथियारों की बरामदगी में बड़ी संख्या में पिस्तौल और हथगोले शामिल हैं।

 

इन हत्याओं को मुठभेड़ों की तुलना में अधिक मीडिया कवरेज भी मिल रहा है। अभी हो रहे पलायन, जिसे मिनी माइग्रेशन कहना ठीक होगा, के कारण केंद्र और केंद्र शासित क्षेत्र दोनों की सरकारों को लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा, जो कि भविष्य में होने वाले चुनावों पर भी असर डालेगी। इसका लाभ पाकिस्तान को होगा। इससे पाकिस्तान एफएटीएफ जैसी वैश्विक संस्थाओं की नाराजगी से भी बच जाएगा, जहां भारतीय पक्ष उस पर दबाव बनाता है।

 

सुरक्षा बलों को ऐसे बदलते परिदृश्य में अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। औचक हत्याओं में शामिल इन मॉड्यूल को तोड़ने के लिए स्थानीय खुफिया इनपुट सबसे आवश्यक हैं। ये या तो लोगों की व्यक्तिगत निगरानी या इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के माध्यम से मिल सकते हैं। लिहाजा ऐसे अभियान स्थानीय पुलिस नेटवर्क के नेतृत्व में चलाने की जरूरत है, जिन्हें सुरक्षा एजेंसियां मदद करें। मौजूदा परिदृश्य में मुठभेड़ वाली रणनीति काम नहीं कर सकती जिसका नेतृत्व सेना के हाथ में होता है। साथ ही प्रवासी मजदूरों के शिविरों और उनके आवासीय क्षेत्रों में गश्त बढ़ाई जानी चाहिए।

 

जब तक सफलता नहीं मिलती है और मॉड्यूल को तोड़ा नहीं जाता, तब तक बचाव ही आदर्श होना चाहिए। अति उत्साह में सामूहिक गिरफ्तारियों से सिर्फ स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर गुस्सा बढ़ेगा कि उन्हें गलत तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। जरूरत है धैर्य, दृढ़ता और समर्थन के लिए स्थानीय लोगों को समझाने की। इसके साथ ही गैर स्थानीय लोगों में भरोसा जगाने की ताकि वे पलायन न करें, क्योंकि पाकिस्तान यही तो चाहता है। सरकार को समग्र रूप से इसी दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।

 

With the targeting of two non-local labourers from Bihar fear has begun spreading amongst the migrant community in the region. Thus far, 11 have been killed this month of which five are non-Kashmiri’s. This has built an atmosphere of insecurity and has led to a mini migration from the valley, which is what was being aimed for by terrorists. To add to fear of non-locals are statements issued by terrorist groups warning them that they are currently the targets.

The state police has reacted by arresting about 900 overground workers aiming to identify modules involved in these rampant killings. In an intensified anti-terrorist drive, 13 terrorists have also been killed in 9 encounters in recent days, some of whom were behind the targeting of innocents. However, this has done little to stem the migration and reduce the prevailing fear.

Targeting innocents is a changed strategy from earlier where security forces were being attacked with the intention of conveying a message that Kashmiri resistance cannot be stopped by deploying military power. This strategy having failed and terrorists being on the backfoot, there was a need for a change. A similar approach was adopted in the early nineties where Kashmiri Pundits and Sikhs were the targets resulting in a mass migration.

Innocent civilians are an easy target as they go about their daily routine despite a prevailing environment of terrorism. They can be surveyed over a period of time and attacked when they are most vulnerable. The J and K police have described these random killings as ‘hybrid warfare’ where terrorists fire from point blank range after closing in on their victims and vanish. They also lob grenades from a distance on security pickets. Inputs from CCTV cameras installed across the region have proved valueless in identifying the culprits.

This changed approach has come about for a variety of reasons. Firstly, terrorists are being eliminated at a rapid pace. As soon as an individual picks up the gun and posts his picture on social media he becomes a target for security forces. Support from the local populace is also restricted. Hence life span of terrorists are very short. In adopting this change, those who carry out the attack are not on police radars and hence are not easy to detect. They kill and melt into the local population making identification and elimination difficult. They are instructed about their target either through social media or in person and post the incident continue with their normal routine until called again.

Secondly, infiltration though continuing, is limited. Pak inducted terrorists are currently in their hideouts seeking to remain away from contact with security forces. Once they are detected, forces, despite casualties, would make an all-out effort to eliminate them, as is the case in the ongoing Punch encounter. Pakistan had banked on violence during encounters which always led to loss of lives of stone pelters leading to more joining militant ranks. With the downfall of the Hurriyat and blocking of Hawala funds, violence has almost come to a standstill. This has impacted survivability of Pak terrorists.

By employing local youth, Pakistan has the benefit that India cannot blame them for the current killings. This will ensure that the ceasefire continues, enabling Pak to concentrate on its western borders, where the situation continues to be tense. To support this change in strategy, Pakistan has begun inducting weapons like pistols and grenades, rather than AKs. All arms recoveries in the recent past has included larger numbers of pistols and grenades.

These killings provide greater media coverage than encounters where terrorists are eliminated. Added to media coverage are remarks by political parties and family members of those killed only enhancing an atmosphere of uncertainty and risk. By creating a mini migration, the ruling dispensation, at both the centre and the Union Territory would face public wrath, thus impacting its standing in future elections. This would benefit Pakistan. Another plus would be that it would keep Pakistan off the radar in global institutions like the FATF, where Indian pressures are high.

Security forces need to alter their approach to deal with this changing scenario. To break these modules involving random killing local intelligence inputs are most essential. These could either flow through human intelligence or electronic surveillance. Thus, operations would need to be led by local police networks backed by other security agencies. The army leading, as in case of encounters, cannot be followed in the current scenario. In addition, increased patrolling of migrant labour camps and resident areas must be implemented. Until there is success and modules are being broken, deterrence should be the norm. Over enthusiasm by resorting to mass arrests would only add to local anger at being unfairly targeted.

Simultaneously, the government must work towards convincing the migrant population on not moving out and promising that it is ready to provide security. Migration would only further these incidents as terrorists, or their sympathizers, would view it as a victory. Movement of migrant labour also impacts the local economy and hence support from senior respected residents of villages and localities must be sought. The public must be warned that such actions would impact tourism, which is gaining ground in the region, and their cooperation to stem this tide would benefit the region. 

Every new approach by terrorists succeeds in initial stages. They possess the advantage as they have chosen the direction as also the date, time and place of killing innocents. With passage of time, these networks will be located and broken down. While terrorists may possess an upper hand currently, it will not be for long. What is needed is patience, perseverance and convincing the public for support as also non-locals from migrating and playing into the hands of Pakistan. It has to be a whole of government approach and not just one led by security agencies.